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रविवार, 6 दिसंबर 2009

पत्थर

मैं शिलान्यास का पत्थर हूं। पत्थर कभी रोते नहीं। मगर मैं रो रहा हूं। कारण, मैं ऐसा-वैसा नहीं, एक महत्वपूर्ण पत्थर हूं। महत्वपूर्ण हो जाने के बाद बहुतों को रोना पड़ता है। हे कृपानिधान, तू मुझे साधारण पत्थर ही रहने देता, तो तेरा क्या बिगड़ जाता? मैंने कब चाहा था कि तू मुझे अपनी इबादतगाह में चुने जाने का सौभाग्य प्रदान करे।

मैं वीआईपी पत्थर नहीं बनना चाहता था प्रभु। लेकिन तूने बना दिया। अब मुझको इस वीआईपीयत का संत्रास ताउम्र झेलना ही होगा। झेल रहा हूं। तू भी कैसे-कैसे खेल खेलता है लीलाधारी? जो किसी धोबी का पाट नहीं बन सकता था, उसे तूने शिलान्यास का पत्थर बना डाला। तूने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा गिरधारी। और जहां लाकर पटका है, वहां की मिट्टी तक मुझसे नफरत करती है।

मैं तीन फीट बाहर और दो फीट अंदर गड़ा हूं। चतुर्दिक झाड़-झंखाड़ उग आए हैं। हवा चलती है, तो झाड़ियां मेरे तन-बदन पर झापड़ मारती हैं। मैं चोट खा-खाकर काला पड़ गया हूं। मैं अहर्निश अपने दुश्मनों से घिरा हुआ हूं। उनकी ऊंचाइयां बढ़ती जा रही हैं। हो सकता है, एक दिन ऐसा भी आए, जब मैं दिखलाई देना बंद हो जाऊं। और मैं दोष भी किसे दूं? जब मुझे रोपने वाले उन कर-कमलों ने ही मुझे बिसार दिया, तब गैरों से काहे का गिला-शिकवा? कुछ तो आचार संहिता की मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफा नहीं होता। जरूर उन कर-कमलों पर कोई विपदा आन पड़ी होगी। उनका खुद का वीआईपीपन गुम हो चुका होगा। वरना जिसने मेरा शिलान्यास किया, मेरा अनावरण किया, वह शतिर्या एक-न-एक रोज मेरा उद्घाटन करने भी आता।

एक शिला की नियति भी क्या? उसे अहिल्या की मानिंद शताब्दियों प्रतीक्षा के बाद राम की चरण-धूलि मयस्सर होती है। यहां तो मैं उनके पांवों की बाट जोह रहा हूं, जिन्होंने पहली बार शिलान्यास का पत्थर बनने के बाद मुझे हाथ लगाया था। काश, वे मिल जाते तो गले से लिपटकर पूछता -हे सहोदर, कहां चले गए थे आप?

मुझमें और आप में फर्क ही क्या है? लोगबाग आपको भी पत्थर ही समझते हैं। वह और बात है कि आप पूजे जाने वाले पत्थर हैं। आप पर मालाएं चढ़ाई जाती हैं। जनता आपकी परिक्रमा करती है। और एक मैं हूं कि राह चलते कोई भूला-भटका स्वामिभक्त जानवर भी अपना जल चढ़ाने नहीं आता। हे जग के उद्धारकरैया, मेरी सुध कब लोगे?

मैं जहां पर गड़ा हूं, किसी समय यहां से एक राह गुजरती थी। अब पगडंडी रह गई है। गाहे-बगाहे पास के गांवों के बटोही इधर से गुजरते हैं। मैं हसरत भरी निगाहों से उन्हें ताकता हूं। वे मुझे घूरते तक नहीं। गलती से किसी की नजर पड़ जाती है, तो वह हंसकर बगल वाले राहगीर से कहता है -'वह देखो, सत्यानाश का पत्थर।' शिलान्यास की जगह पर सत्यानाश सुनकर मेरे दिल पर क्या गुजरती होगी, जो कभी मेरी राह से गुजरा होगा, वह भी ठीक से नहीं समझ सकता।

काश, मैं शिलान्यास का पत्थर बनने की जगह पर किसी सिल-बट्टे का पत्थर होता! तमाम स्वादिष्ट चटनियों के मजे उठाता। काश, मैं किसी बाथरूम में जड़ा गया होता। कम-से-कम पानी-पानी तो हो रहा होता। तबीयत तर रहती। एक अंधेरी रात में, मेरे सामने बैठकर ढेर सारे चोरों ने लूट के माल का बंटवारा किया। तब मुझे बहुत अच्छा लगा था। मेरी सोहबत किसी के काम तो आई। उस रोज मुझे मेरा भविष्य अंधेरे में भी साफ-साफ नजर आने लगा था। सोचने लगा, चाहे मुझे यहीं रखा जाए या उखाड़कर किसी और जगह पर जड़ दिया जाए, मेरे इर्द-गिर्द जो भी निर्माण होगा, वहां पर चोरों का जमघट लगेगा। तब वे दिन दहाड़े लूट के माल का बंटवारा किया करेंगे।

कल की बात है। दो लोगों ने एकाएक मेरी तरफ हसरत भरी निगाहों से देखा। मैं उनकी नीयत ताड़ गया। समझ गया, चुनावों के दिन हैं। वे उम्मीदवार थे। मुझे अपना चुनावी मुद्दा बनाने वाले थे। जय हो। इसी बहाने मैं इस लोकतंत्र के काम आ सकूंगा। मुझे मालूम है, अब पत्थर ही लोकतंत्र के काम आते हैं। चाहे वे हाथों में हों, या फिर शिलान्यास के बहाने जमीन में गड़े हुए हों।

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