..बहाना ढूंढ़ लिया
कुछ रोज गुजारने की खातिर,एक आशियाना ढूंढ़ लिया
ता-उम्र होश में न आ सकू,ऐसा एक मयखाना ढूंढ़ लिया
क्या मालूम था मुझे,के होगी झूठी वो महफिले अपनी
अब आयी अक्ल,के जीने की खातिर वीराना ढूंढ़ लिया
पूछेगा गर खुदा मुझको,लाये क्या हो उस जहा से तुम
कर दूंगा नजर ये दिल टुटा,ऐसा एक नजराना ढूंढ़ लिया
मिलती नही जो इस दुनिया में,एक पहचान अब मुझको
अक्स जो देखा शीशे में अपना,के कोई बेगाना ढूंढ़ लिया
अपनी सूरत-ऐ-हाल पे 'sandeep'हसता है ये सारा जमाना
हम भी समझेंगे के लोगो ने,हसने का बहाना ढूंढ़ लिया
शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009
बुधवार, 23 दिसंबर 2009
quotes
Remember This One?
If we were logical,
the future would be bleak indeed.
But we are more than logical.
We are human beings,
and we have faith,
And we have hope.
- Jacques Cousteau
If we were logical,
the future would be bleak indeed.
But we are more than logical.
We are human beings,
and we have faith,
And we have hope.
- Jacques Cousteau
ख़ुद दिल में रह के आँख से पर्दा करे कोई|
हाँ लुत्फ़ जब है पाके भी ढूँढा करे कोई|
तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दिया,
किस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई|
दुनिया लरज़ गई दिल-ए-हिरमाँनसीब की,
इस तरह साज़-ए-ऐश न छेड़ा करे कोई|
मुझ को ये आरज़ू वो उठायें नक़ाब ख़ुद,
उन को ये इन्तज़ार तक़ाज़ा करे कोई|
रन्गीनी-ए-नक़ाब में ग़ुम हो गई नज़र,
क्या बे-हिजाबियों का तक़ाज़ा करे कोई|
या तो किसी को जुर्रत-ए-दीदार ही न हो,
या फिर मेरी निगाह से देखा करे कोई|
होती है इस में हुस्न की तौहीन ऐ 'मज़ाज़',
इतना न अहल-ए-इश्क़ को रुसवा करे कोई|
हाँ लुत्फ़ जब है पाके भी ढूँढा करे कोई|
तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दिया,
किस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई|
दुनिया लरज़ गई दिल-ए-हिरमाँनसीब की,
इस तरह साज़-ए-ऐश न छेड़ा करे कोई|
मुझ को ये आरज़ू वो उठायें नक़ाब ख़ुद,
उन को ये इन्तज़ार तक़ाज़ा करे कोई|
रन्गीनी-ए-नक़ाब में ग़ुम हो गई नज़र,
क्या बे-हिजाबियों का तक़ाज़ा करे कोई|
या तो किसी को जुर्रत-ए-दीदार ही न हो,
या फिर मेरी निगाह से देखा करे कोई|
होती है इस में हुस्न की तौहीन ऐ 'मज़ाज़',
इतना न अहल-ए-इश्क़ को रुसवा करे कोई|
संतमत
"कह कबीर तू राम की अंश"
परमात्मा का अंश तो परमात्मा ही हुवा न छोटासा
सोने की इतनी बड़ी डली लेलो उसमे से थोडा टुकडा काट लो तो वो सोना ही हुवा न
शुद्ध सोना है हम सब, परंतु इस सोने को माया का,कर्मो का कचरा लग गया है, लेकिन कचरे में भी सोना है तो उसका मोल थोडी कम हो गया कोई, साफ करो उसकी कीमत वही है
कोई दोष, कोई खोट नहीं है हममे, कोई पापी भी नहीं है, पाप भी अपवित्र नहीं कर सकता हमें, अगर परमात्मा का अंश अपवित्र हो गया तो, परमात्मा भी अपवित्र हो सकता है
भगवन के पास न पाप जायेगा न पुण्य जायेगा, अगर सिर्फ पुण्य ही वहा जा सकता है, तो गलत है, फिर वो भगवान नहीं है, वहा सौदा नहीं है, वहा सिर्फ शुद्ध जायेगा
पाप भी बोझ है और पुण्य भी, दोनों का फल भुगतना है अच्छा या बुरा
लेकिन परमात्मा की भक्ति एक एसा यज्ञ है सब स्वाहा, पाप क्या पुण्य भी नहीं बचेंगा
"पुरन प्रगटे भाग्य कर्म का कलसा फूटा"
एक दिन एसा आता है भगवन की भक्ति-ध्यान करते-करते इतना तेज आ जाता है जो घडा है कर्म का जिसमे पाप-पुण्य जो कुछ भी भरा पड़ा है वो फुट जाता है और ये अंश परमात्मा में समां जाता है, और परमात्मा ही हो जाता है
परमात्मा का अंश तो परमात्मा ही हुवा न छोटासा
सोने की इतनी बड़ी डली लेलो उसमे से थोडा टुकडा काट लो तो वो सोना ही हुवा न
शुद्ध सोना है हम सब, परंतु इस सोने को माया का,कर्मो का कचरा लग गया है, लेकिन कचरे में भी सोना है तो उसका मोल थोडी कम हो गया कोई, साफ करो उसकी कीमत वही है
कोई दोष, कोई खोट नहीं है हममे, कोई पापी भी नहीं है, पाप भी अपवित्र नहीं कर सकता हमें, अगर परमात्मा का अंश अपवित्र हो गया तो, परमात्मा भी अपवित्र हो सकता है
भगवन के पास न पाप जायेगा न पुण्य जायेगा, अगर सिर्फ पुण्य ही वहा जा सकता है, तो गलत है, फिर वो भगवान नहीं है, वहा सौदा नहीं है, वहा सिर्फ शुद्ध जायेगा
पाप भी बोझ है और पुण्य भी, दोनों का फल भुगतना है अच्छा या बुरा
लेकिन परमात्मा की भक्ति एक एसा यज्ञ है सब स्वाहा, पाप क्या पुण्य भी नहीं बचेंगा
"पुरन प्रगटे भाग्य कर्म का कलसा फूटा"
एक दिन एसा आता है भगवन की भक्ति-ध्यान करते-करते इतना तेज आ जाता है जो घडा है कर्म का जिसमे पाप-पुण्य जो कुछ भी भरा पड़ा है वो फुट जाता है और ये अंश परमात्मा में समां जाता है, और परमात्मा ही हो जाता है
जाति धरम का भेद क्यों
मेरी सांसों में यही दहशत समाई रहती है
मज़हब से कौमें बँटी तो वतन का क्या होगा।
यूँ ही खिंचती रही दीवार ग़र दरम्यान दिल के
तो सोचो हश्र क्या कल घर के आँगन का होगा।
जिस जगह की बुनियाद बशर की लाश पर ठहरे
वो कुछ भी हो लेकिन ख़ुदा का घर नहीं होगा।
मज़हब के नाम पर कौ़में बनाने वालों सुन लो तुम
काम कोई दूसरा इससे ज़हाँ में बदतर नहीं होगा।
मज़हब के नाम पर दंगे, सियासत के हुक्म पे फितन
यूँ ही चलते रहे तो सोचो, ज़रा अमन का क्या होगा।
अहले-वतन शोलों के हाथों दामन न अपना दो
दामन रेशमी है "दीपक" फिर दामन का क्या होगा।
@कवि दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.co.in
इस सन्देश को भारत के जन मानस तक पहुँचाने मे सहयोग दे.ताकि इस स्वस्थ समाज की नींव रखी जा सके और आवाम चुनाव मे सोच कर मतदान करे.
मज़हब से कौमें बँटी तो वतन का क्या होगा।
यूँ ही खिंचती रही दीवार ग़र दरम्यान दिल के
तो सोचो हश्र क्या कल घर के आँगन का होगा।
जिस जगह की बुनियाद बशर की लाश पर ठहरे
वो कुछ भी हो लेकिन ख़ुदा का घर नहीं होगा।
मज़हब के नाम पर कौ़में बनाने वालों सुन लो तुम
काम कोई दूसरा इससे ज़हाँ में बदतर नहीं होगा।
मज़हब के नाम पर दंगे, सियासत के हुक्म पे फितन
यूँ ही चलते रहे तो सोचो, ज़रा अमन का क्या होगा।
अहले-वतन शोलों के हाथों दामन न अपना दो
दामन रेशमी है "दीपक" फिर दामन का क्या होगा।
@कवि दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.co.in
इस सन्देश को भारत के जन मानस तक पहुँचाने मे सहयोग दे.ताकि इस स्वस्थ समाज की नींव रखी जा सके और आवाम चुनाव मे सोच कर मतदान करे.
संतमत:
"जो तुझ भावे सोई भली कर"
जो तू चाहे, जो तू करे वो ही अच्छा है,जो तू मुझे दे वो भी अच्छा, जो तू मुझे न दे, वो भी अच्छा!
मै नासमझ क्या कर सकता हु, मै ना समझ तो नासमझिया ही तो कर सकता हु, मै नासमझ क्या मांग सकता हु? एक बच्चा मांगेंगा भी तो क्या? खिलौना या चौकलेट इससे ज्यादा क्या मांगेंगा? मै क्या मांगता हु इसपे ध्यान मत देना हे परमपिता, जो तू दे वो भी अच्छा,जो तू ना दे वो भी अच्छा
समुद्र की सतह पे एक लहर है उसकी इच्छा ही क्या हो सकती है?वो इच्छा करे भी तो क्या फ़ायदा? क्युकी थोडी देर बाद वो लहर भी मिट जाएँगी! जो सागर की इच्छा, वो लहर की इच्छा हो जाये, और जो तेरी इच्छा है परमपिता वो मेरी इच्छा हो जाये!
"हुकुम रजाई चलना नानक लिखिया नाल"
तेरे ही हुकुम पे चलू, एसा हो जाये कुछ, तू जानता है की सही क्या है, क्युकी तू कल भी था तेरे को कल का भी पता है, तू आज भी है तेरे को आज का भी पता है, तू कल भी होंगा, की कल क्या चाहिए वो भी तुझे पता है, मुझे क्या मालूम कुछ? इसलिए तू जो करेंगा वो ही सही होंगा!
तू सदा सलामत निरंकार, तू आद् सच है जुगात सच है तू कल भी सच होंगा तू ही तू होंगा, तेरी ही मर्जी!
जो तू चाहे, जो तू करे वो ही अच्छा है,जो तू मुझे दे वो भी अच्छा, जो तू मुझे न दे, वो भी अच्छा!
मै नासमझ क्या कर सकता हु, मै ना समझ तो नासमझिया ही तो कर सकता हु, मै नासमझ क्या मांग सकता हु? एक बच्चा मांगेंगा भी तो क्या? खिलौना या चौकलेट इससे ज्यादा क्या मांगेंगा? मै क्या मांगता हु इसपे ध्यान मत देना हे परमपिता, जो तू दे वो भी अच्छा,जो तू ना दे वो भी अच्छा
समुद्र की सतह पे एक लहर है उसकी इच्छा ही क्या हो सकती है?वो इच्छा करे भी तो क्या फ़ायदा? क्युकी थोडी देर बाद वो लहर भी मिट जाएँगी! जो सागर की इच्छा, वो लहर की इच्छा हो जाये, और जो तेरी इच्छा है परमपिता वो मेरी इच्छा हो जाये!
"हुकुम रजाई चलना नानक लिखिया नाल"
तेरे ही हुकुम पे चलू, एसा हो जाये कुछ, तू जानता है की सही क्या है, क्युकी तू कल भी था तेरे को कल का भी पता है, तू आज भी है तेरे को आज का भी पता है, तू कल भी होंगा, की कल क्या चाहिए वो भी तुझे पता है, मुझे क्या मालूम कुछ? इसलिए तू जो करेंगा वो ही सही होंगा!
तू सदा सलामत निरंकार, तू आद् सच है जुगात सच है तू कल भी सच होंगा तू ही तू होंगा, तेरी ही मर्जी!
नया din
भला मुझ को परखने का नतीजा निकला
ज़ख़्म-ए-दिल आप की नज़रों से भी गहरा निकला
तोड़ कर देख लिया आईना-ए-दिल तूने
तेरी सूरत के सिवा और बता क्या निकला
जब कभी तुझको पुकारा मेरी तनहाई ने
बू उड़ी धूप से, तसवीर से साया निकला
jindagi जम गई पत्थर की तरह होंठों पर
डूब कर भी तेरे दरिया से मैं प्यासा निकला
ज़ख़्म-ए-दिल आप की नज़रों से भी गहरा निकला
तोड़ कर देख लिया आईना-ए-दिल तूने
तेरी सूरत के सिवा और बता क्या निकला
जब कभी तुझको पुकारा मेरी तनहाई ने
बू उड़ी धूप से, तसवीर से साया निकला
jindagi जम गई पत्थर की तरह होंठों पर
डूब कर भी तेरे दरिया से मैं प्यासा निकला
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