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बुधवार, 6 जुलाई 2011

What is a Friend


What is a Friend?A friend isSomeone who cares about you,Someone who likes you just the way you are.A friend isSomeone who does things with you,Someone who keeps your secrets.A friend isSomeone who sometimes gets angry with you,Someone who might hurt your feelings sometimeseven when they don't mean to.A friend isSomeone who comforts you when you're sad,Someone who laughs with you when you're happy.A friend isSomeone who wants to be with you,Someone who enjoys your company.A friend isSomeone you'll remember alwaysEven when they grow up and move away.A friend isSomeone who is loyal and says good things about you,Someone who gets mad if someone else is mean to you.A friend isA link to someone's humanity like food for the soul to share,Someone to hold onto when life's follies bring despair.A friend isF-frank, R-righteous, I-intrepid, E-earnest, N-noble, D-decentA friend is a friend—always

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

..बहाना ढूंढ़ लिया

..बहाना ढूंढ़ लिया
कुछ रोज गुजारने की खातिर,एक आशियाना ढूंढ़ लिया
ता-उम्र होश में न आ सकू,ऐसा एक मयखाना ढूंढ़ लिया

क्या मालूम था मुझे,के होगी झूठी वो महफिले अपनी
अब आयी अक्ल,के जीने की खातिर वीराना ढूंढ़ लिया

पूछेगा गर खुदा मुझको,लाये क्या हो उस जहा से तुम
कर दूंगा नजर ये दिल टुटा,ऐसा एक नजराना ढूंढ़ लिया

मिलती नही जो इस दुनिया में,एक पहचान अब मुझको
अक्स जो देखा शीशे में अपना,के कोई बेगाना ढूंढ़ लिया

अपनी सूरत-ऐ-हाल पे 'sandeep'हसता है ये सारा जमाना
हम भी समझेंगे के लोगो ने,हसने का बहाना ढूंढ़ लिया

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

quotes

Remember This One?

If we were logical,
the future would be bleak indeed.
But we are more than logical.
We are human beings,
and we have faith,
And we have hope.

- Jacques Cousteau
ख़ुद दिल में रह के आँख से पर्दा करे कोई|
हाँ लुत्फ़ जब है पाके भी ढूँढा करे कोई|

तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दिया,
किस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई|

दुनिया लरज़ गई दिल-ए-हिरमाँनसीब की,
इस तरह साज़-ए-ऐश न छेड़ा करे कोई|

मुझ को ये आरज़ू वो उठायें नक़ाब ख़ुद,
उन को ये इन्तज़ार तक़ाज़ा करे कोई|

रन्गीनी-ए-नक़ाब में ग़ुम हो गई नज़र,
क्या बे-हिजाबियों का तक़ाज़ा करे कोई|

या तो किसी को जुर्रत-ए-दीदार ही न हो,
या फिर मेरी निगाह से देखा करे कोई|

होती है इस में हुस्न की तौहीन ऐ 'मज़ाज़',
इतना न अहल-ए-इश्क़ को रुसवा करे कोई|

संतमत

"कह कबीर तू राम की अंश"
परमात्मा का अंश तो परमात्मा ही हुवा न छोटासा
सोने की इतनी बड़ी डली लेलो उसमे से थोडा टुकडा काट लो तो वो सोना ही हुवा न
शुद्ध सोना है हम सब, परंतु इस सोने को माया का,कर्मो का कचरा लग गया है, लेकिन कचरे में भी सोना है तो उसका मोल थोडी कम हो गया कोई, साफ करो उसकी कीमत वही है
कोई दोष, कोई खोट नहीं है हममे, कोई पापी भी नहीं है, पाप भी अपवित्र नहीं कर सकता हमें, अगर परमात्मा का अंश अपवित्र हो गया तो, परमात्मा भी अपवित्र हो सकता है
भगवन के पास न पाप जायेगा न पुण्य जायेगा, अगर सिर्फ पुण्य ही वहा जा सकता है, तो गलत है, फिर वो भगवान नहीं है, वहा सौदा नहीं है, वहा सिर्फ शुद्ध जायेगा
पाप भी बोझ है और पुण्य भी, दोनों का फल भुगतना है अच्छा या बुरा
लेकिन परमात्मा की भक्ति एक एसा यज्ञ है सब स्वाहा, पाप क्या पुण्य भी नहीं बचेंगा
"पुरन प्रगटे भाग्य कर्म का कलसा फूटा"
एक दिन एसा आता है भगवन की भक्ति-ध्यान करते-करते इतना तेज आ जाता है जो घडा है कर्म का जिसमे पाप-पुण्य जो कुछ भी भरा पड़ा है वो फुट जाता है और ये अंश परमात्मा में समां जाता है, और परमात्मा ही हो जाता है

जाति धरम का भेद क्यों

मेरी सांसों में यही दहशत समाई रहती है
मज़हब से कौमें बँटी तो वतन का क्या होगा।
यूँ ही खिंचती रही दीवार ग़र दरम्यान दिल के
तो सोचो हश्र क्या कल घर के आँगन का होगा।
जिस जगह की बुनियाद बशर की लाश पर ठहरे
वो कुछ भी हो लेकिन ख़ुदा का घर नहीं होगा।
मज़हब के नाम पर कौ़में बनाने वालों सुन लो तुम
काम कोई दूसरा इससे ज़हाँ में बदतर नहीं होगा।
मज़हब के नाम पर दंगे, सियासत के हुक्म पे फितन
यूँ ही चलते रहे तो सोचो, ज़रा अमन का क्या होगा।
अहले-वतन शोलों के हाथों दामन न अपना दो
दामन रेशमी है "दीपक" फिर दामन का क्या होगा।
@कवि दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.co.in
इस सन्देश को भारत के जन मानस तक पहुँचाने मे सहयोग दे.ताकि इस स्वस्थ समाज की नींव रखी जा सके और आवाम चुनाव मे सोच कर मतदान करे.

संतमत:

"जो तुझ भावे सोई भली कर"
जो तू चाहे, जो तू करे वो ही अच्छा है,जो तू मुझे दे वो भी अच्छा, जो तू मुझे न दे, वो भी अच्छा!
मै नासमझ क्या कर सकता हु, मै ना समझ तो नासमझिया ही तो कर सकता हु, मै नासमझ क्या मांग सकता हु? एक बच्चा मांगेंगा भी तो क्या? खिलौना या चौकलेट इससे ज्यादा क्या मांगेंगा? मै क्या मांगता हु इसपे ध्यान मत देना हे परमपिता, जो तू दे वो भी अच्छा,जो तू ना दे वो भी अच्छा
समुद्र की सतह पे एक लहर है उसकी इच्छा ही क्या हो सकती है?वो इच्छा करे भी तो क्या फ़ायदा? क्युकी थोडी देर बाद वो लहर भी मिट जाएँगी! जो सागर की इच्छा, वो लहर की इच्छा हो जाये, और जो तेरी इच्छा है परमपिता वो मेरी इच्छा हो जाये!
"हुकुम रजाई चलना नानक लिखिया नाल"
तेरे ही हुकुम पे चलू, एसा हो जाये कुछ, तू जानता है की सही क्या है, क्युकी तू कल भी था तेरे को कल का भी पता है, तू आज भी है तेरे को आज का भी पता है, तू कल भी होंगा, की कल क्या चाहिए वो भी तुझे पता है, मुझे क्या मालूम कुछ? इसलिए तू जो करेंगा वो ही सही होंगा!
तू सदा सलामत निरंकार, तू आद् सच है जुगात सच है तू कल भी सच होंगा तू ही तू होंगा, तेरी ही मर्जी!

नया din

भला मुझ को परखने का नतीजा निकला
ज़ख़्म-ए-दिल आप की नज़रों से भी गहरा निकला

तोड़ कर देख लिया आईना-ए-दिल तूने
तेरी सूरत के सिवा और बता क्या निकला

जब कभी तुझको पुकारा मेरी तनहाई ने
बू उड़ी धूप से, तसवीर से साया निकला

jindagi जम गई पत्थर की तरह होंठों पर
डूब कर भी तेरे दरिया से मैं प्यासा निकला

जीवन कैसे जिए

तन में क्या रखा है बन्दे, तन मिटटी की माया है...
मिट्टी में ही मिल जायेगा, जो मिटटी से आया है
मिट्टी है पहचान सभी की, मिटटी ही तो जननी है
मिट्टी ही है फल जीवन का मिट्टी ही तो करनी है
मिट्टी में ही उगते देखा पौधों, पेडों, पत्तों को
मिट्टी में ही बनते देखा गलियों सड़कों मेडों को
मिट्टी में धंसते देखा मैंने महल अटरों को
मिट्टी से ही आते देखा मैंने प्रलय, बहारों को
एक मिट्टी पर जागा सब जग एक मिट्टी पर सोया
एक मिट्टी पर पाया सबकुछ एक मिट्टी पर खोया
कोई इस मिट्टी को पूजे कोई तिलक लगाये
मिट्टी में ही पैदा होकर मिट्टी में मिल जाये
बाँट नहीं पाओगे इसको खींचो जितनी रेखा
मिट्टी जिसके साथ गयी हो ऐसा कोई देखा??
फिर क्यों तेरा मेरा कहकर मचा रहे हो शोर
इसका भी है-उसका भी है, ये हो या वो छोर
ऐसा सोचोगे तो तुमको बंधेगी एक डोर
कितनी अदभुत होगी जब आएगी ऐसी भोर.

jeevan

हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।
उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।
छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।
उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।
वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।
रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।
तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।
हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।
मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।
मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।
दर्द कभी आखरी नहीं होता ,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।
मंज़िल को पाना जरुरी भी नहीं ,
मंज़िलो से सदा फासला रखना ।
सूरज तो रोज ही आता है मगर ,
अपने दिलो में ‘ दीप ‘ को जला कर रखना
किसी के इतने पास न जा

के दूर जाना खौफ़ बन जाये

एक कदम पीछे देखने पर

सीधा रास्ता भी खाई नज़र आये


किसी को इतना अपना न बना

कि उसे खोने का डर लगा रहे

इसी डर के बीच एक दिन ऐसा न आये

तु पल पल खुद को ही खोने लगे


किसी के इतने सपने न देख

के काली रात भी रन्गीली लगे

आन्ख खुले तो बर्दाश्त न हो

जब सपना टूट टूट कर बिखरने लगे


किसी को इतना प्यार न कर

के बैठे बैठे आन्ख नम हो जाये

उसे गर मिले एक दर्द

इधर जिन्दगी के दो पल कम हो जाये


किसी के बारे मे इतना न सोच

कि सोच का मतलब ही वो बन जाये

भीड के बीच भी

लगे तन्हाई से जकडे गये


किसी को इतना याद न कर

कि जहा देखो वोही नज़र आये

राह देख देख कर कही ऐसा न हो

जिन्दगी पीछे छूट जाय

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

god is here

खुशी की उपस्थिति का सबसे अचूक संकेत है भगवान

रविवार, 6 दिसंबर 2009

सहज योग : क्या है शिव योग

ओम नम: शिवाय।- 'ओम' प्रथम नाम परमात्मा का फिर 'नमन' शिव को करते हैं।

'सत्यम, शिवम और सुंदरम' - जो सत्य है वह ब्रह्म है- ब्रह्म अर्थात परमात्मा। जो शिव है वह परम शुभ और पवित्र है और जो सुंदरम है वही प्रकृति है। अर्थात परमात्मा, शिव और पार्वती के अलावा कुछ भी जानने योग्य नहीं है। इन्हें जानना और इन्हीं में लीन हो जाने का मार्ग है- योग।

शिव कहते हैं 'मनुष्य पशु है'- इस पशुता को समझना ही योग और तंत्र का प्रारम्भ है। योग में मोक्ष या परमात्मा प्राप्ति के तीन मार्ग हैं- जागरण, अभ्यास और समर्पण। तंत्रयोग है समर्पण का मार्ग। जब शिव ने जाना क‍ि उस परम तत्व या सत्य को जानने का मार्ग है, तो उन्होंने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु वह मार्ग बताया।

अमरनाथ के अमृत वचन : शिव द्वारा माँ पार्वती को जो ज्ञान दिया गया वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था। उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएँ हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। 'विज्ञान भैरव तंत्र' एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के '‍विज्ञान भैरव तंत्र' और 'शिव संहिता' में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है। भगवान शिव कहते हैं- 'वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:' अर्थात वाम मार्ग अत्यन्त गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है।-मेरुतंत्र

आदि पुरुष : आदि का अर्थ प्रारम्भ। शिव को आदिदेव या आदिनाथ कहा जाता है। नाथ और शैव सम्प्रदाय के आदिदेव। शिव से ही योग का जन्म माना गया है। वैदिककाल के रुद्र का स्वरूप और जीवन दर्शन पौराणिक काल आते-आते पूरी तरह से बदल गया। वेद जिन्हें रुद्र कहते है, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं। शिव का न प्रारंभ है और न अंत।

'मनुष्य पशु है'

शिव कहते हैं 'मनुष्य पशु है'- इस पशुता को समझना ही योग और तंत्र का प्रारम्भ है। योग में मोक्ष या परमात्मा प्राप्ति के तीन मार्ग हैं- जागरण, अभ्यास और समर्पण। तंत्रयोग है समर्पण का मार्ग। जब शिव ने जाना क‍ि उस परम तत्व या सत्य को जानने का मार्ग है।

शिव को स्वयंभू इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वे आदिदेव हैं, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था सिर्फ वही थे, उन्हीं से धरती पर सब कुछ हो गया। ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर प्रारम्भ में उनका निवास रहा। वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था। फिर जब समुद्र हटा तो अन्य धरती का प्रकटन हुआ।

ज्योतिषियों और पुराणिकों की धारणा से सर्वथा भिन्न है भगवान शंकर का दर्शन और जीवन। उनके इस दर्शन और ‍‍जीवन को जो समझता है वही महायोगी के मर्म, कर्म और मार्ग को भी समझता है।

शैव परम्परा : ऋग्वेद में वृषभदेव का वर्णन मिलता है, जो जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ हैं, उन्हें ही वातरशना मुनि‍‍‍ कहा गया है। वे उनका जीवन अवधूत जैसा ब‍िताते थे। योगयुक्त व्यक्ति ही अवधूत हो सकता है। माना जाता है कि शिव के बाद मूलत: उन्हीं से एक ऐसी परम्परा की शुरुआत हुई जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगम्बर और सूफी सम्प्रदाय में वि‍भक्त हो गई।

इस्लाम के प्रभाव में आकर सूफियों से कमंडल और धूना छूट गया, लेकिन चिमटा और खप्पर आज भी नहीं छूटा। जो माला रुद्राक्ष की होती थी, वह अब हरे, पीले, सफेद, मोतियों की होती है। जो कुछ है सब उस योगीश्वर शिव के प्रति ही है। उनके निराकार स्वरूप को शिव और साकार स्वरूप को शंकर कहते हैं।

शैव और नाथ सम्प्रदाय की बहुत प्राचीन परम्परा रही है। जैन और नाथ सम्प्रदाय में जिन नौ नाथ की चर्चा की गई है वह सभी योगी ही थे और शिव के प्रति ही थे।

शिव का दर्शन : शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वह सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में ज‍ीयो, वर्तमान में जीयो अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

शिव का शिवयोग : इसे तंत्र या वामयोग भी कहते हैं। शिवयोग में धारणा, ध्यान और समाधि अर्थात योग के अंतिम तीन अंग का ही प्रचलन अधिक रहा है।

अंतत : शिव के दर्शन और जीवन की कहानी दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है और इस भिन्नता का कारण है परम्परा और भाषा का बदलते रहना, पुराणिकों द्वारा उनकी मनमानी व्याख्या करते रहना।

सहज योग

'संयम, ईश्वर प्राणिधान, अंग-संचालन, प्राणायाम, ध्यान।'


भागदौड़ भरी जीवन शैली के चलते मनुष्य ने प्रकृति और स्वयं का सान्निध्य खो दिया है। इसी वजह से जीवन में कई तरह के रोग और शोक जन्म लेते हैं। हमारे पास नियमित रूप से योग करने या स्वस्थ रहने के अन्य कोई उपाय करने का समय भी नहीं है। यही सोचकर हम आपके लिए लाए हैं योग के यम, नियम और आसन में से कुछ ऐसे उपाय, जिनके जरिए आप फटाफट योग कर शरीर और मन को सेहतमंद रख सकते हैं।

(1) संयम ही तप है : संयम एक ऐसा शब्द है, जिसके आगे पदार्थ या परमाणुओं की नहीं चलती। ठेठ भाषा में कहें तो ठान लेना, जिद करना या हठ करना। यदि तुम व्यसन करते हो और संयम नहीं है तो मरते दम तक उसे नहीं छोड़ पाओगे। इसी तरह गुस्सा करने या ज्यादा बोलने की आदत भी होती है।

संयम की शुरुआत आप छोटे-छोटे संकल्प से कर सकते हैं। संकल्प लें कि आज से मैं वहीं करूँगा, जो मैं चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ खुश रहना, स्वस्थ रहना और सर्वाधिक योग्य होना। व्रत से भी संयम साधा जा सकता है। आहार-विहार, निंद्रा-जाग्रति और मौन तथा जरूरत से ज्यादा बोलने की स्थिति में संयम से ही स्वास्थ्य तथा मोक्ष घटित होता है। संयम नहीं है तो यम, नियम, आसन आदि सभी व्यर्थ सिद्ध होते हैं।

(2) ईश्वर प्राणिधान : एकेश्वरवादी न भी हों तो भी जीवनपर्यंत किसी एक पर चित्त को लगाकर उसी के प्रति समर्पित रहने से चित्त संकल्पवान, धारणा सम्पन्न तथा निर्भिक होने लगता है। यह जीवन की सफलता हेतु अत्यंत आवश्यक है। जो व्यक्ति ग्रह-नक्षत्र, असंख्‍य देवी-देवता, तंत्र-मंत्र और तरह-तरह के अंधविश्वासों पर विश्वास करता है, उसका संपूर्ण जीवन भ्रम, भटकाव और विरोधाभासों में ही बीत जाता है। इससे निर्णयहीनता का जन्म होता है।

(3) अंग-संचालन : अंग-संचालन को सूक्ष्म व्यायाम भी कहते हैं। इसे आसनों की शुरुआत के पूर्व किया जाता है। इससे शरीर आसन करने लायक तैयार हो जाता है। सूक्ष्म व्यायाम के अंतर्गत नेत्र, गर्दन, कंधे, हाथ-पैरों की एड़ी-पंजे, घुटने, नितंब-कुल्हों आदि सभी की बेहतर वर्जिश होती है, जो हम थोड़े से समय में ही कर सकते है। इसके लिए किसी अतिरिक्त समय की आवश्यकता नहीं होती। आप किसी योग शिक्षक से अंग-संचालन सीखकर उसे घर या ऑफिस में कहीं भी कर सकते हैं।

(4) प्राणायाम : अंग-संचालन करते हुए यदि आप इसमें अनुलोम-विलोम प्राणायाम भी जोड़ देते हैं तो यह एक तरह से आपके भीतर के अंगों और सूक्ष्म नाड़ियों को शुद्ध-पुष्ट कर देगा। जब भी मौका मिले, प्राणायाम को अच्‍छे से सीखकर करें।

(5) ध्यान : ध्यान के बारे में भी आजकल सभी जानने लगे हैं। ध्यान हमारी ऊर्जा को फिर से संचित करने का कार्य करता है, इसलिए सिर्फ पाँच मिनट का ध्यान आप कहीं भी कर सकते हैं। खासकर सोते और उठते समय इसे बिस्तर पर ही किसी भी सुखासन में किया जा सकता है।

उपरोक्त पाँच उपाय आपके जीवन को बदलने की क्षमता रखते हैं, बशर्ते आप इन्हें ईमानदारी से नियमित करें।

सहज योग

शायद आपने सोचा भी न हो कि दौड़ना भी एक ध्यान हो सकता है, लेकिन दौड़ने वाले को कई बार ध्यान के अपूर्व अनुभव हुए हैं और वे चकित हुए, क्योंकि इसकी तो वे खोज भी नहीं कर रहे थे। कौन सोचता है कि कोई दौड़ने वाला परमात्मा का अनुभव कर लेगा? परंतु ऐसा हुआ है। और अब तो दौड़ना एक नए प्रकार का ध्यान बनता जा रहा है। जब दौड़ रहे हों तो ऐसा हो सकता है।

यदि आप कभी एक दौड़ाक रहे हों, यदि आपने सुबह-सुबह दौड़ने का आनंद लिया हो जब हवा ताजी हो और सारा विश्‍व नींद से लौटता हो, जागता हो- आप दौड़ रहे हों और आपका शरीर सुंदर रूप से गति कर रहा हो; ताजी हवा रात के अंधकार से गुजरकर जन्मा नया संसार- जैसे हर चीज गीत गाती हो- आप बहुत जीवंत अनुभव करते हो...एक क्षण आता है जब दौड़ने वाला विलीन हो जाता है और बस दौड़ना ही बचता है। शरीर, मन और आत्मा एक साथ कार्य करने लगते हैं; अचानक एक आंतरिक आनंदोन्माद का आविर्भाव होता है।

दौड़ाक कई बार संयोग से चौथे के, तुरीय के अनुभव से गुजर जाते हैं, यद्यपि वे उसे चूक जाएँगे- वे सोचेंगे कि शायद दौड़ने के कारण ही उन्होंने इस क्षण का आनंद लिया- कि प्यारा दिन था, शरीर स्वस्थ था और संसार सुंदर, और यह अनुभव एक भावदशा मात्र थी। वे उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देते- परंतु वे ध्यान दें, तो मेरी अपनी समझ है कि एक दौड़ाक किसी अन्य व्यक्ति की अपेक्षा ‍अधिक सरलता से ध्यान के करीब आ सकता है।

'जॉगिंग' (लयबद्ध धीरे-धीरे दौड़ना) अपूर्व रूप से सहयोगी हो सकती है, तैरना बहुत सहयोगी हो सकता है। इन सब चीजों को ध्यान में रूपांतरित कर लेना है।

ध्यान की पुरानी धारणा को छोड़ दें कि किसी वृक्ष के नीचे योग-मुद्रा में बैठना ही ध्यान है। वह तो बहुत से उपायों में से एक उपाय है और हो सकता है वह कुछ लोगों के लिए उपयुक्त हो, लेकिन सबके लिए उपयुक्त नहीं है। एक छोटे बच्चे के लिए यह ध्यान नहीं, उत्पीड़न है। एक युवा व्यक्ति जो जीवंत और स्पंदित है, उसके लिए यह दमन होगा ध्यान नहीं।

सुबह सड़क पर दौड़ना शुरू करें। आधा मील से शुरू करें और फिर एक मील करें और अंतत: कम से कम तीन मील तक आ जाएँ। दौड़ते समय पूरे शरीर का उपयोग करें; ऐसे न दौड़ें जैसे कसे कपड़े पहने हुए हों। छोटे बच्चे की तरह दौड़ें, पूरे शरीर का- हाथों और पैरों का- उपयोग करें और दौड़ें। पेट से गहरी श्वास लें। फिर किसी वृक्ष के नीचे बैठ जाएँ, विश्राम करें, पसीना बहने दें और शीतल हवा लगने दें; शांत अनुभव करें। यह बहुत गहन रूप से सहयोगी होगा।

कभी-कभी बिना जूते-चप्पल पहने नंगे पाँव जमीन पर ही खड़े हो जाएँ और शीतलता को, कोमलता को, उष्मा को महसूस करें। उस क्षण में पृथ्वी जो कुछ भी देने को तैयार है, उसे अनुभव करें और अपने में बहने दें। पृथ्‍वी के साथ जुड़ जाएँ।

यदि आप पृथ्वी से जुड़ गए, तो जीवन से जुड़ गए। यदि आप पृथ्‍वी से जुड़ गए, तो अपने शरीर से जुड़ गए। यदि आप पृथ्‍वी से जुड़ गए, तो बहुत संवेदनशील और केंद्रस्थ हो जाएँगे। और यही तो चाहिए।

दौड़ने में कभी भी विशेषज्ञ न बनें; नौसिखिए ही बने रहें, ताकि सजगता रखी जा सके। जब कभी आपको लगे कि दौड़ना यंत्रवत हो गया है, तो उसे छोड़ दें; फिर तैरकर देखो। यदि वह भी यंत्रवत हो जाए, तो नृत्य को लो। यह बात याद रखने की है कि कृत्य मात्र एक परिस्थिति है कि जागरण पैदा हो सके। जब तक वह जागरण निर्मित करे तब तक ठीक है। जब वह जागरण पैदा करना बंद कर दे तो किसी काम का न रहा; किसी और कृत्य को पकड़ो जहाँ आपको फिर से सजग होना पड़े। किसी भी कृत्य को यंत्रवत मत होने दो।

योग फॉर फिटनेस नही फॉर ब्यूटी

दुनिया की हर औरत अपने आपको हमेशा सुंदर दिखाना चाहती है। इसी कोशिश में वह कृत्रिम उपाय भी अपनाती है। इसमें मेकअप करने से लेकर बाल रंगने तक कई उपाय शामिल हैं। इन सब उपायों का असर लंबे समय तक नहीं टिक पाता है। योगासन और प्राकृतिक चिकित्सा दो ऐसे साधन हैं जिनके जरिए महिलाएँ उम्रदराज होने पर भी सुंदर लग सकती हैं।

क्या करें : योगासन के लिए रोज 20-25 मिनट जरूर निकालें। इससे त्वचा की झुर्रियों के साथ पेट की थुलथुल चर्बी से भी मुक्ति मिल सकेगी। मुलायम और चमकदार त्वचा पाने के लिए सीधे खड़े हो कर दोनों हथेलियों से चेहरे को ढँक लीजिए। गहरी साँसें लीजिए। चंद मिनटों के बाद उँगलियों की पोरों से ठोड़ी से लेकर माथे तक मालिश करिए। यह कसरत कम से कम तीन बार कीजिए। इसी के साथ कपालभाति एवं अनुलोम विलोम भी कर लें।

सुडौल गरदन : पैरों को पास में रखकर खड़े हो जाइए। चेहरे को पीछे की ओर मोड़कर जितना पीछे जा सकते हों जाएँ। थोड़ी देर इसी अवस्था में रुकें। अब ठोड़ी को छाती की हड्डी पर गले के नीचे चिपका दें। यदि चिपकाना संभव न हो तब भी कोशिश करते रहें। सीधे खड़े रहें और कंधों को बिना हिलाए सिर को दोनों साइड में झुकाएँ। कोशिश करें कि सिर को कंधे पर टिका सकें। ऐसा दोनों ओर करें। इस आसन को कम से कम 20 बार करें। इस आसन के बाद गरदन को दोनों तरफ तेजी से 10 बार झटकें।

अपने पैरों को थोड़ा फैलाकर खड़े हो जाएँ। हाथों को कमर पर रखें। गहरी साँस लेते हुए जोर से छोड़ें। यह कसरत बारी-बारी से 40-40 के सेट में करें। इसे बढ़ाते हुए 100 तक ले जा सकते हैं। पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएँ। हाथों को बारी-बारी से उपर उठाएँ और नीचे ले जाएँ। इसे इस तरह करें मानो कोई रस्सी खींच रहे हों। यह कसरत 50 से शुरू करके धीरे-धीरे बढ़ाते रहें।

अब पैरों पर बैठ जाएँ और दोनों घुटनों में अंतर रखते हुए हाथों की उँगलियों को आपस में फँसाते हुए सामने की ओर फैला लें। हाथों को इस तरह ऊपर-नीचे करें मानों कोई लकड़ी काट रहे हों। ऐसा 20 बार करें।

पेट की थुलथुल चर्बी : अपने पैरों को फैलाकर खड़े हो जाएँ। आगे की ओर बिना घुटना मोड़े पैरों की उँगलियों को हाथ की उँगलियों की पोरों से पकड़ने की कोशिश करें। संभव है कि पहली बार आप ऐसा नहीं कर पाएँ लेकिन रोज कोशिश करेंगे तो शायद एक दिन कर पाएँ। रोजाना 10-10 के सेट में दो बार करें।

पैरों को दो फुट की दूरी तक फैला लें और शरीर को आगे की ओर 90 डिग्री के कोण बनाते हुए झुका लें। अब सीधे हाथ की उँगलियों से बाएँ पैर की उँगलियों को स्पर्श करने का प्रयत्न करें। दोनों ओर इसे कम से कम 20 बार करें।

जमीन पर सीधे लेट जाएँ। पैरों को पास में रखें। अब पैरों को बिना घुटने मोड़े ऊपर उठाने का प्रयत्न करें। इसी तरह सिर को धड़ सहित ऊपर उठाने की कोशिश करें। इस तरह शरीर की आकृति एक नाव की तरह हो जाएगी। नौका जैसी आकृति बनाते हुए एक मिनट तक रुकें। इसके अलावा पेट की चर्बी गलाने के लिए आप पश्चिमोत्तान आसन कर सकते हैं। पवनमुक्तासन, भुजंगासन, धनुर्रासन आसानी से कर सकते हैं।

सुडौल कमर : नाजुक या सुडौल कमर पाना हर महिला का ऐसा सपना है जो कम ही पूरा होता है। कमर का घेरा कम तब ही लगता है जब पेट की अनावश्यक चर्बी खत्म हो जाती है। आप चाहें तो इन आसनों को आजमा सकती हैं।

पैरों को एक फुट की दूरी बनाते हुए खड़ी हो जाएँ। हाथों को साइड में जमीन के समानांतर कंधों की ऊँचाई तक फैला लें। अब शरीर के उपरी हिस्से को बाईं ओर जितना मोड़ सकते हों मोड़ लें तथा पीछे की ओर देखें। ध्यान रखें कि पैर जमीन पर टिके रहें। ऐसा ही दूसरी तरफ भी करें। दस से बीस बार ऐसा करें।

दोनों पैरों को फैलाकर खड़े रहें। कमर पर हाथ रख लें। आगे की ओर झुकते हुए जंघाओं को स्पर्श करने की कोशिश करें। तीन बार से शुरू करके आगे बढ़ा सकती हैं।

जरूरी है मन की सुंदरता : मन की सुंदरता तभी प्राप्त होती है जब मन शांत हो। मस्तिष्क प्रिय विचारों से गदगद हो। तनाव जितना कम होगा उतना चेहरे पर खिंचाव नहीं दिखाई देगा। अनुलोम विलोम, कपालभाती तथा श्वास की कसरतें दम-खम तो देंगी ही साथ ही सुंदर भी बना देंगी।

सच बयाँ करती कविता

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूँ सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़ि़या है घात में
होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्ना से- बहन, सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई! क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहां
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहां
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है, मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी´
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था

भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
`जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने´
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर `माल वो चोरी का तूने क्या किया´
`कैसी चोरी माल कैसा´ उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर

ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
`मेरा मुँह क्या देखते हो! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो´
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे

´´ कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं ´´
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा"
इक सिपाही ने कहा "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उनझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
`कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल´
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए

अपनी लड़ाई ख़ुद लड़नी पड़ती है

जिंदगी की इस धारा में
किस किसकी नाव पार लगाओगे।
समंदर से गहरी है इसकी धारा
लहरे इतनी ऊंची कि
आकाश का भी तोड़ दे तारा
अपनी सोच को इस किनारे से
उस किनारे तक ले जाते हुए
स्वयं ही ख्यालों में डूब जाओगे।
दूसरे को मझधार से तभी तो निकाल सकते हो
जब पहले अपनी नाव संभाल पाओगे।
दूर उठती लहरें देखकर
खेलने का मन करता है
पर उनकी ताकत तभी समझ आयेगी
जब उनसे लड़ने जाओगे।

यहाँ सब कुछ बिकता है

दिन के उजाले में

लगता है बाजार

कहीं शय तो कहीं आदमी

बिक जाता है

पैसा हो जेब में तो

आदमी ही खरीददार हो जाता है

चारों तरफ फैला शोर

कोई किसकी सुन पाता है

कोई खड़ा बाजार में खरीददार बनकर

कोई बिकने के इंतजार में बेसब्र हो जाता है

भीड़ में आदमी ढूंढता है सुख

सौदे में अपना देखता अस्त्तिव

भ्रम से भला कौन मुक्त हो पाता है

रात की खामोशी में भी डरता है

वह आदमी जो

दिन में बिकता है

या खरीदकर आता है सौदे में किसी का ईमान

दिन के दृश्य रात को भी सताते हैं

अपने पाप से रंगे हाथ

अंधेरे में भी चमकते नजर आते है

मयस्सर होती है जिंदगी उन्हीं को

जो न खरीददार हैं न बिकाऊ

सौदे से पर आजाद होकर जीना

जिसके नसीब में है

वह जिंदगी का मतलब समझ पाता है
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रोटी

पापी पेट का है सवाल
इसलिये रोटी पर मचा रहता है
इस दुनियां में हमेशा बवाल
थाली में रोटी सजती हैं
तो फिर चाहिये मक्खनी दाल
नाक तक रोटी भर जाये
फिर उठता है अगले वक्त की रोटी का सवाल
पेट भरकर फिर खाली हो जाता है
रोटी का थाल फिर सजकर आता है
पर रोटी से इंसान का दिल कभी नहीं भरा
यही है एक कमाल
………………………
रोटी का इंसान से
बहुत गहरा है रिश्ता
जीवन भर रोटी की जुगाड़ में
घर से काम
और काम से घर की
दौड़ में हमेशा पिसता
हर सांस में बसी है उसके ख्वाहिशों
से जकड़ जाता है
जैसे चुंबक की तरफ
लोहा खिंचता